Monday, March 2, 2009

जीना आ गया....

बंद किवाड़ में अटक गया था
चुनरी का कोना कही
छील कर उसको वही छोड़
आगे बढ़ना आ गया
तो मुझे जीना आ गया

बहती हवा में डुबकी लगा कर
बाल भिगोये है मेने
नील गगन में तैरते पंछियों संग
सुर मिलाना आ गया
हां मुझे जीना आ गया।

चाँद की गोद में बैठ कर पहरा दीया है मेने
और फीर एक रात हौले से
जाल डाला था मेने
उन दो तारों को हथेली पर रखकर
नाचना सीख लीया मेने
सो मुझे जीना आ गया।

पतझड़ के पेडों की बातें
चुपके से सुनली है मेने
साथ ही पीली चादर को
तन पे लपेटा है
गिलहैरी के घोसले में झपकी ली है मेने
और चूहों संग बिल में छुप कर देखा है मेने
तभी तो पता लगा मुझे की
जीना आ गया मुझे।

बारीश की बूंदों की लय पर
तलवे दिबोये है मेने
और नदी की तरंग में खो कर
ख़ुद को पा लीया मेने
तब अचानक महसूस हुआ
की जीना आ गया मुझे।

घुलते सूरज में अपने को
चीडा कर देखा है मेने
झीलामिल झील में लहराती छाया संग
लुका-छुपी खेली है मेने
सात रंगों को आँख के गोलों में
हाथ पकड़ते देखा है
तो यकीन हो गया मुझे
की जीना गया मुझे...

No comments:

Post a Comment